नैनो यूरिया-डीएपी से घटेगी खेती की लागत, बढ़ेगा उत्पादन ; किसानों के लिए बन रहा बेहतर विकल्प..

भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश प्रवक्ता बी.पी. सिंह ने किसानों से नई तकनीक अपनाने की अपील की..

रायपुर/बिलासपुर। कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के बढ़ते उपयोग के बीच नैनो यूरिया और नैनो डीएपी किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभर रहे हैं। खेती में बढ़ती लागत और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता के बीच नैनो खाद को कम लागत, बेहतर उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी माध्यम माना जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से नैनो खाद का उपयोग करें तो खेती की लागत में कमी आने के साथ उत्पादन क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

प्रदेश के धान उत्पादक क्षेत्रों में हर साल बड़ी मात्रा में यूरिया और डीएपी का उपयोग किया जाता है। लगातार बढ़ते उपयोग के कारण किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है, वहीं मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरण पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। ऐसे में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी को पारंपरिक रासायनिक खादों के बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार नैनो तकनीक आधारित उर्वरकों की विशेषता यह है कि पौधे इनमें मौजूद पोषक तत्वों को अधिक प्रभावी ढंग से अवशोषित कर लेते हैं। इसके कारण कम मात्रा में खाद उपयोग करने पर भी बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नैनो खाद के संतुलित उपयोग से फसल उत्पादन में 5 से 8 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है, जबकि उर्वरकों पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकता है।

जानकारों के मुताबिक वर्तमान में अधिकांश किसान प्रति एकड़ दो से तीन बोरी यूरिया तथा लगभग एक बोरी डीएपी का उपयोग करते हैं, जिस पर करीब दो हजार रुपये या उससे अधिक खर्च आता है। इसके विपरीत 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया को एक बोरी पारंपरिक यूरिया के बराबर प्रभावी माना जाता है। इसी तरह नैनो डीएपी भी कम मात्रा में उपयोग कर फसल को आवश्यक पोषण उपलब्ध कराने में सक्षम है। इससे किसानों को लागत घटाने के साथ बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नैनो खाद केवल आर्थिक दृष्टि से ही लाभकारी नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पारंपरिक रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है और भूजल प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती है। नैनो उर्वरकों के उपयोग से इन समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है, जिससे टिकाऊ और संतुलित कृषि व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।

किसानों तक इस तकनीक का लाभ पहुंचाने के लिए प्रदेश में सहकारी समितियों और कृषि सेवा केंद्रों के माध्यम से नैनो यूरिया और नैनो डीएपी की उपलब्धता बढ़ाई जा रही है। कृषि विभाग भी किसानों को इसके उपयोग के संबंध में जागरूक करने और प्रशिक्षण देने पर जोर दे रहा है।

भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश प्रवक्ता बी.पी. सिंह ने कहा कि नैनो खाद कृषि क्षेत्र में एक सकारात्मक और दूरगामी बदलाव का माध्यम बन सकता है। उन्होंने कहा कि इससे किसानों की उत्पादन लागत कम होगी, मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर बनी रहेगी और अधिक उत्पादन के माध्यम से किसानों की आय में वृद्धि होगी। उन्होंने किसानों से वैज्ञानिक एवं आधुनिक तकनीकों को अपनाने का आग्रह करते हुए कहा कि बदलते समय के साथ खेती में नवाचार आवश्यक है।

बी.पी. सिंह ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही हैं। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो आने वाले वर्षों में खेती की तस्वीर बदलने में अहम भूमिका निभा सकती है। उन्होंने विश्वास जताया कि नई तकनीक आधारित उर्वरकों का उपयोग बढ़ने से किसानों को आर्थिक लाभ मिलने के साथ कृषि क्षेत्र को भी नई मजबूती मिलेगी।

खेती का नया दौर..

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाला समय स्मार्ट और टिकाऊ खेती का होगा। ऐसे में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे आधुनिक उर्वरक किसानों के लिए न केवल लागत कम करने का माध्यम बनेंगे, बल्कि बेहतर उत्पादन, स्वस्थ मिट्टी और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे। यही वजह है कि अब नैनो खाद को कृषि क्षेत्र के भविष्य की तकनीक के रूप में देखा जा रहा है।