

बिलासपुर। देश के प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और रंगमंच कलाकार राजेंद्र गुप्ता ने बिलासपुर में अपनी दमदार प्रस्तुति से दर्शकों को भावनाओं के गहरे संसार में डुबो दिया। उन्होंने प्रख्यात कवि धूमिल की चर्चित कविता “संसद से सड़क तक” का एकल नाट्य मंचन किया, जिसे दर्शकों ने देर तक सराहा।


यह कार्यक्रम प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। मंचन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सभागार में हुआ, जहां बड़ी संख्या में साहित्य और कला प्रेमी उपस्थित रहे।
अभिनय में गूंजा आक्रोश, पीड़ा और सवाल..

राजेंद्र गुप्ता ने अपने सशक्त अभिनय और प्रभावशाली आवाज़ के माध्यम से कविता को जीवंत कर दिया। उनकी प्रस्तुति में कहीं गहरी निराशा थी, तो कहीं व्यवस्था के प्रति गुस्सा और सवाल।
दर्शक कभी तालियों से हॉल गूंजा देते, तो कभी गहरे सन्नाटे में डूब जाते। लंबे एकल मंचन के बावजूद उन्होंने अंत तक दर्शकों को बांधे रखा, जो उनके अनुभव और कला की गहराई को दर्शाता है।
नैतिकता की दुहाई देने वालों की रीढ़ गायब..
मंचन के दौरान उन्होंने समाज और व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि नैतिकता की दुहाई देने वाले जिसकी पीठ ठोकते हैं, उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है। इस संवाद पर पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा।
निर्देशन और संगीत ने बढ़ाया प्रभाव..
इस नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन आर. एस. विकल ने किया, जबकि संगीत आदित्य शर्मा का था। वॉयस ओवर और मंच संयोजन ने कविता की गहराई को और प्रभावी बनाया।
कार्यक्रम में साहित्यकारों की मौजूदगी..
कार्यक्रम की शुरुआत में मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार लोक बाबू ने कहा कि धूमिल की यह कविता आज के समय में और भी प्रासंगिक हो गई है।

इस अवसर पर डॉ. राकेश सक्सेना, डॉ. आर. ए. शर्मा, अरुण दाभडकर, हबीब खान, नथमल शर्मा, सत्यभामा अवस्थी, रफीक खान, अजय श्रीवास्तव, अजय नज़ात, सचिन शर्मा, नरेश अग्रवाल, कल्याणी वर्मा सहित कई साहित्यकार और कला प्रेमी उपस्थित रहे।
संस्था वस्तुतः के चेतन आनंद दुबे ने राजेंद्र गुप्ता का शॉल-श्रीफल से सम्मान किया। कार्यक्रम का संचालन सत्यभामा अवस्थी ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन सचिन शर्मा ने किया।
संवाद सत्र में उठे तीखे सवाल..

मंचन के बाद आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र भी बेहद रोचक रहा। दर्शकों ने कविता और वर्तमान हालात पर सवाल पूछे।
राजेंद्र गुप्ता ने कहा कि पांच दशक पहले उठाए गए सवाल आज भी हमें उतना ही बेचैन करते हैं, बल्कि आज के समय में उनकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है। एक दर्शक के सवाल पर उन्होंने मुस्कराते हुए जवाब दिया कि “पानी वहीं ठहरता है जहां गड्ढा होता है”, जिस पर हॉल तालियों से गूंज उठा।
कविता के जरिए समाज को आईना..
पूरे कार्यक्रम में यह स्पष्ट हुआ कि कविता सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि समाज का आईना होती है। राजेंद्र गुप्ता ने अपने अभिनय से यह साबित किया कि रंगमंच के माध्यम से आज भी समाज के ज्वलंत मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया जा सकता है।
यह प्रस्तुति बिलासपुर के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक यादगार आयोजन बन गई, जिसने दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया।



