चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही मनाया जाए वास्तविक नववर्ष, यह पूरी तरह वैज्ञानिक : ललित अग्रवाल

पृथ्वी की परिक्रमा, दिन-रात की समानता और ऋतु परिवर्तन के आधार पर 19 मार्च को नववर्ष मानना अधिक तार्किक..

बिलासपुर। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्ष मनाने की परंपरा पूरी तरह वैज्ञानिक और तार्किक है। हिंदू दैनंदिनी के ललित अग्रवाल ने कहा कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और इस परिक्रमा को पूरा करने में जितना समय लगता है, उसे एक वर्ष कहा जाता है। इसलिए नववर्ष उसी दिन से मानना चाहिए, जहां से पृथ्वी की इस परिक्रमा की शुरुआत को तार्किक आधार पर स्वीकार किया जा सके।

उन्होंने बताया कि पृथ्वी की परिक्रमा के कारण दो प्रमुख परिवर्तन होते हैं-दिन और रात की अवधि में बदलाव तथा ऋतुओं का परिवर्तन। साल में चार ऐसे अवसर आते हैं, जब यह परिवर्तन विशेष रूप से स्पष्ट दिखाई देता है। इनमें 21 मार्च और 21 सितंबर को दिन और रात लगभग बराबर होते हैं, जबकि 21 जून को सबसे बड़ा दिन और 21 दिसंबर को सबसे लंबी रात होती है।

ललित अग्रवाल के अनुसार इन चार दिनों में से यदि किसी एक दिन को वर्ष का प्रारंभ माना जाए तो वह अधिक तार्किक होगा। इनमें भी वह दिन अधिक उपयुक्त है, जिसके बाद दिन बड़े होने लगते हैं। यह अवसर 21 या 22 मार्च के आसपास आता है। इसी कारण भारतीय परंपरा में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष की शुरुआत माना गया है।

उन्होंने कहा कि मार्च का महीना वसंत ऋतु का समय होता है, जब प्रकृति में नए सृजन की शुरुआत होती है। पेड़-पौधों में नई कोंपलें निकलती हैं और वातावरण में नवजीवन का संचार होता है। इसलिए ऋतुओं के आधार पर भी यही समय वर्षारंभ के लिए उपयुक्त माना जाता है।

ललित अग्रवाल ने बताया कि अंग्रेजी महीनों के नामों में भी इसका संकेत मिलता है। जैसे सितंबर शब्द में ‘सेप्टा’ का अर्थ सात, अक्टूबर में ‘ऑक्टो’ का अर्थ आठ, नवंबर में ‘नोवा’ का अर्थ नौ और दिसंबर में ‘डेका’ का अर्थ दस होता है। इससे संकेत मिलता है कि प्राचीन समय में मार्च को वर्ष का पहला महीना माना जाता था।

उन्होंने यह भी बताया कि महीनों में दिनों के वितरण से भी यह बात स्पष्ट होती है। अधिकांश महीनों में 30 या 31 दिन होते हैं, जबकि फरवरी में केवल 28 या 29 दिन होते हैं।इसका कारण यह माना जाता है कि पहले फरवरी वर्ष का अंतिम महीना हुआ करता था, इसलिए बचे हुए दिनों को इसी महीने में जोड़ा गया।

ललित अग्रवाल के अनुसार भारत सरकार के आधिकारिक कैलेंडर शक संवत में भी 21 या 22 मार्च के आसपास वर्ष का आरंभ माना जाता है। इसी प्रकार चंद्र पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष की शुरुआत होती है, जो सामान्यतः मार्च के तीसरे सप्ताह में आती है। इस वर्ष यह तिथि 19 मार्च 2026 को पड़ रही है, जिसे युगाब्द 5128 का आरंभ माना जाएगा।

उन्होंने बताया कि इसी वैज्ञानिक आधार पर 21 जून को वर्ष का सबसे बड़ा दिन होने के कारण विश्व योग दिवस मनाया जाता है, जबकि 21 दिसंबर को सबसे लंबी रात होने के कारण ध्यान के लिए विशेष महत्व दिया जाता है।

ललित अग्रवाल ने कहा कि 1 जनवरी को वर्षारंभ मानने के पीछे कोई स्पष्ट वैज्ञानिक आधार नहीं है, जबकि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा प्रकृति, खगोल विज्ञान और भारतीय परंपरा तीनों दृष्टियों से अधिक उपयुक्त और तर्कसंगत है। उन्होंने आम जनता से अपील की कि इस वैज्ञानिक तथ्य को समझते हुए भारतीय नववर्ष को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही मनाने पर विचार करें।

ललित अग्रवाल, हिंदू दैनंदिनी