राम विवाह प्रसंग से भावविभोर हुआ बिलासपुर, संत श्री विजय कौशल जी महाराज की कथा में उमड़ा श्रद्धा का सागर..

बिलासपुर। रामकथा के पावन प्रसंग में बिलासपुर नगरी उस समय भाव-विभोर हो उठी जब संत श्री विजय कौशल जी महाराज ने भगवान श्रीराम के विवाह प्रसंग का अत्यंत मार्मिक, जीवंत एवं भावप्रधान वर्णन किया। कथा के दौरान स्वयंवर से लेकर जनकपुर और अयोध्या तक की प्रत्येक लीला श्रोताओं के हृदय में सजीव हो उठी।

महाराज श्री ने कहा कि स्वयंवर सभा में उपस्थित सभी लोगों ने देखा कि भगवान श्रीराम ने प्रत्यंचा चढ़ाकर शिवधनुष तोड़ दिया, किंतु किसी को यह समझ नहीं आया कि यह कैसे हुआ। भगवान की क्रिया दिखाई नहीं देती, परंतु उसका परिणाम अवश्य दिखाई देता है। यही ईश्वर की लीला है जहाँ कोई दिखावा नहीं, केवल कार्य की सिद्धि होती है। भगवान परशुराम जी का कोप भी भगवान श्रीराम की विनम्रता, शालीनता एवं आत्मीय व्यवहार से शांत हो गया और वे संतुष्ट चित्त से तपस्या के लिए प्रस्थान कर गए।

संत श्री विजय कौशल जी महाराज ने भगवान राम के विवाह का समाचार जब राजा दशरथ तक पहुँचता है, उस प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि राजा दशरथ की आँखों से आनंदाश्रु बहने लगे। ये पूर्ण सुख के आँसू थे—रसीले, मधुर। उन्होंने बताया कि दुःख के आँसू कसैले होते हैं, किंतु आनंद के आँसू आत्मा को तृप्त कर देते हैं। राजा दशरथ द्वारा संदेशवाहक का सम्मान करने का प्रयास और उसका विनम्रतापूर्वक इंकार करना कथा का अत्यंत भावपूर्ण क्षण रहा।

महाराज श्री ने बताया कि गुरु वशिष्ठ के निर्देशन में विवाह की समस्त तैयारियाँ की गईं और देवर्षि नारद ने देवलोक में जाकर समस्त देवताओं को भगवान राम के विवाह का आमंत्रण दिया। उन्होंने कहा कि भगवान राम का अवतार सेतु-बंधन के लिए हुआ था—वे सदैव लोगों को, परिवारों को और समाज को जोड़ने वाले हैं।

कथा के दौरान महाराज जी ने बेटी और पिता के पवित्र, निश्छल प्रेम पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बेटियाँ पिता के हर सुख-दुःख की सहभागी होती हैं, किंतु पिता के देहांत के बाद उनके अधिकार सीमित हो जाते हैं। इस प्रसंग को सुनकर अनेक महिला श्रद्धालुओं की आँखें नम हो गईं। उन्होंने कहा—भारत बेटियों का देश है और बेटियों के सम्मान से ही समाज सशक्त बनता है।

जनकपुर में बारात के स्वागत, देवताओं द्वारा ब्राह्मण वेश धारण करने, ब्रह्मा जी के आगमन और माता जानकी द्वारा जनकपुर को क्षणभर में बैकुंठ स्वरूप प्रदान करने का वर्णन सुनकर पूरा पंडाल भक्तिरस में डूब गया। संत श्री ने कहा कि माता जानकी का सौंदर्य वर्णन का विषय नहीं, बल्कि पूजन का विषय है। विवाह मंडप में राजा जनक और राजा दशरथ के ब्रह्म मिलन से संपूर्ण मिथिला नगरी आनंद और उल्लास से भर उठी।

विवाह संस्कार के दौरान कन्यादान का प्रसंग अत्यंत करुणामय रहा, जब महाराज जनक और माता सुनयना की आँखों से अश्रुधारा बह निकली। इसके पश्चात तीनों अन्य कन्याओं का विवाह भी उसी मंडप में संपन्न हुआ। बारात विदाई के समय जनक दंपत्ति की भावनाएँ देख संपूर्ण वातावरण करुणा और प्रेम से भर गया।

अयोध्या आगमन पर चारों बहुओं का देवियों की भाँति स्वागत किया गया। अगले दिन राज्यसभा में राजा दशरथ द्वारा भगवान राम को सत्ता सौंपने की इच्छा व्यक्त करने पर भगवान राम की विनम्रता और भ्रातृ प्रेम का अद्भुत उदाहरण सामने आया, जब उन्होंने स्वयं सत्ता ग्रहण करने से इंकार करते हुए भरत को योग्य बताया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में मुख्य संरक्षक अमर अग्रवाल, श्रीमती शशि अग्रवाल, पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष नारायण चंदेल, विधायक धरमलाल कौशिक,भूपेन्द्र सवन्नी, रजनीश सिंह सहित अखिल भारतीय नामदेव क्षत्रिय महासंघ, लोधी क्षत्रिय राजपूत समाज, कान्यकुब्ज वैश्य समाज, सेंट्रल बंगाली एसोसिएशन, पंजाबी सभा, पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत, भारतीय मानिकपुरी पनिका समाज, वैश्य साहू समाज, कुशवाहा समाज, पटेल (मरार) समाज, केरला समाज एवं कायस्थ समाज द्वारा संत श्री का भव्य स्वागत किया गया।

कार्यक्रम के अंत में मुख्य संरक्षक अमर अग्रवाल एवं श्रीमती शशि अग्रवाल,कान्हा अग्रवाल एवं श्रीमती सिमरन अग्रवाल द्वारा आरती की गई। श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं से परिपूर्ण यह रामकथा बिलासपुरवासियों के हृदय में अमिट छाप छोड़ गई।